JANMASHTAMI
*HAPPY JANMASHTAMI*
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द्वापर युग के कृष्ण भगवान ने गीता सार के माध्यम से प्रत्यक्ष संदेश देकर यह विशुद्ध रूप से स्पष्ट किया है कि हे अर्जुन/हे मनुष्य तू जो भी करता है मुझको समर्पित करके कर। यहाँ पर मुझको समर्पित करने का मतलब है कि मैं ही आत्म स्वरूप हूँ, मैं ही परंब्रह्म हूँ मैं ही सृस्टि का संचालक हूँ अतः तू जो भी करता है मुझको ही सर्व शक्तिमान जानकर कर । और मुझको ही भज। *अहम ब्रह्मास्मि* ( मैं ही ब्रह्म हूँ )।। मेरे जिस रूप की लीला देख रहा है वह तो मेरा मनुष्य रूप है।मनुष्य रूप मे जितने बाह्याडम्बर कर सकता है कर, परंतु मेरे असली स्वरूप को समझने के लिए तुझे *आत्मवान* ही होना पड़ेगा। ------------- तुझे मेरे आत्म स्वरूप का ही अध्ययन करना पड़ेगा। क्योंकि श्रीकृष्ण एक योगी थे, योग ही वह क्रिया है, जिस पर चलकर साधक परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।ईश्वर के समान हो सकता है इसके बाद उसका सेवक व जीव भाव तिरोहित हो जाता है। * अयम आत्मब्रह्म* (यह आत्मा ब्रह्म है)..।*तत्वमसि* (तुम वही हो )।अहम ब्रह्मास्मि * (मैं ब्रह्मा हूँ ) ।ऋचाओं मे इसी रहस्य की अभिव्यक्ति हुई है।। गीता के सातवें अध्याय मे श्री कृष्ण ने इसी तथ्य का समर्थन किया है।वे कहते है कि उत्तम कर्म करने वाले ज्ञानी भी मुझे भजते हैं।ऐसे विशिष्ट ज्ञानी मुझे प्रिय हैं, क्योंकि मुझे वह तत्त्व से जानने वाले है।वे मुझमें इस्थित हैं और मैं उनमें।ऐसे ज्ञानी भक्तों और श्री कृष्ण की स्थिति मे कोई अंतर नही है। श्री कृष्ण एक योगी, महात्मा व तत्त्वज्ञ है।ऐसे तत्त्वज्ञ महात्मा ही ईश्वर के समान होते हैं। महात्मा श्री कृष्ण ने गीता में सभी जगह अपना परिचय दिया है। टीकाओं मे ना जाकर योगेश्वर श्री कृष्ण की मूलवाणी को देखे, तो श्री कृष्ण के स्वरूप को लेकर भ्रांति नही होगी।गीता के तीसरे अध्याय मे महापुरुषो के लक्षण बताएं और फिर अपने को भी उनके समकक्ष घोषित किया है।श्री कृष्ण ने धर्म और साधना के नाम पर प्रचलित विचारधाराओ कि समीक्षा कर अपना मत भी प्रतिपादित किया है। अतः श्री कृष्ण के योग स्वरूप दृश्य को समझ और उसी अनुसार अपना जीवन यापन कर अपने जीवन को धन्य बना। एक बार पुनः जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। साथ ही साथ आजादी दिवसः की बधाई। जय हिंद, जय भारत।। उन सभी भक्त लोगो को समर्पित जो जीवन असली उद्देश्यों को समझना चाहते हैं।बृजेश जोशी।
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