चेतना की पूर्ण जागृति मे इच्छाओ की पूर्ति की योग्यता
चेतना की पूर्ण जागृति मे इच्छाओ की पूर्ति की योग्यता । " यो जागार तम ऋचा काम यन्ते" यानी जो जागा उसकी ऋचाएँ काम करने लगती है। पूर्ण जागृति का मतलब है ऋचाओ का पूर्ण रूप से काम करना, पूरी ऊर्जा के साथ प्रस्फुरित होकर कार्य करना। शिक्षा की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि बालक की बढ़ती हुई चेतना को पूर्ण जागृत कर दिया जाये।जिससे उसकी चेतना, उसका शरीर और उसका व्यवहार युवक होते होते इतना प्रौढ हो जाए कि उसके लिए कोई भी कार्य कठिन न जाये।और वह अपनी सभी उत्कर्ष कारी इच्छाओ की पूर्ति कर सके। उसकी चेतना की पूर्ण जागृति हो जाए।उसे भारी से भारी बोझ उठा सकने योग्य बना देना चाहिए फिर उसको जो भी बोझ उठाने दिया जाएगा ,उसको हल्का ही लगेगा।फल यह होगा कि समाज मे समस्याएं नही उभरेंगी।
यह जो बोझ उठाने का उदाहरण दिया जा रहा है वह यह समझाने के लिए लिखा जा रहा है कि भारी बोझ उठाना भी मन की शक्ति पर निर्भर करता है।।मन की शक्ति व्यक्ति की चेतना पर निर्भर करती है व्यक्ति की चेतना जितनी परिष्कृत होगी उतनी क्रियाशील और ऊर्जावान होगी। जोकि नियमित भावातीत ध्यान/यूनिफाइड मैडिटेशन से ही सम्भव है। जिसका मन बलवान है वही सब कुछ कर सकता है।मन का महत्व इस प्रकार बताया गया है।
मन एवं मनुष्याणआम कारणम बंधमोक्षयो: श्री गुरु नानक देव जी ने कहा -"मन जीते जग जीत"।
उर्दू कवि इकबाल ने कहा-
"खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तहरीर से पहले खुदा बन्दे से खुद पूछे,बता तेरी रजा क्या है?".। अनादि काल से मन को बलवान बनाने के शाश्वत वैदिक सिद्धान्त और प्रयोग समस्त विश्व मे किसी न् किसी रूप मे प्रचलित चले आरहे हैं: इसलिए कि ये सभी के जीवन के लिए उत्कर्षकारी है।
चेतना की जागृति मे रिद्धि सिद्धि यो का जागरण है।अतः चेतना को परिष्कृत करने की आवश्कता है।
सभी लोग जो सुखमय जीवन की लालसा रखते है।
जय हिंद जय भारत।
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