तनाव चिंता और चेतना

                                                         *तनाव चिन्ता और चेतना*                                        
 tension,worries and consciousness, एक दूसरे के पूरक है। परंतु चेतना (consciousness)  एक शाश्वत (eternal) सत्य है। तनाव और चिंताए एक चिड़िया की तरह होती है जो आती हैं और निकल भी जाती है।उनको रोका तो नही जा सकता है।परंतु दिमाग को शांत करके उन्हें घोंसला रूपी वातावरण देकर कन्ट्रोल किया जा सकता है।क्योंकि यह सब दिमाग केे द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है।दिमाग हमारे शरीर के लिए एक स्थूल भाग है और उस दिमाग को संचालित करने वाली शक्ति चेतना होती है।चेतना सूक्ष्म भाग है।जो की एक शाश्वत सत्य है जो न तो उत्पन्न होती है और न ही नष्ट की जा सकती है।चेतना अपने स्वरुप में स्थित रहती है।उसका दर्शन,स्पर्श और उसमें स्थिति मिलने से पूर्व विश्राम नही है।चेतना का भरण पोषण खुद ब खुद होता है।हम जीवन में जो भी सोचते हैं,विचरते हैं चेतना के प्रत्यक्ष बल के कारण ही संभव होता है।इसलिए चेतना में जिस प्रकार की तरंगें उठती हैं उस प्रकार की बातें दिमाग के द्वारा व्यक्त की जाती हैं  अगर आप दिमाग को घोंसला रुपी वातावरण देकर स्थिर बुद्धि वाला बनाते हो तो वहां पर स्वाभाविक रूप से तनाव और चिंताएं नियंत्रण में आ जाती हैं।जैसा की गीता मैं श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन से कहा-"अगर तू मुझे अनन्य भक्ति के द्वारा पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर मुझे भजता है तो मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए (जैसा तूने देखा),स्पर्श करने के लिए और स्थिति प्राप्त करने के लिये भी सुलभ हो।वही स्थिति मिलेगी जो शाश्वत है,वह स्वरुप मिलेगा जो शाश्वत है उस धाम को प्राप्त कर लोगे जो शाश्वत है"यहाँ पर अनन्य भक्ति का मतलब है किसी देवी देवता का चिंतन न करते हुए चेतना को एक उद्द्देशी बनाना है अतः जब तुम चेतना को एक देशी बनाते हो वहां पर चिंताएं और तनाव अपने आप कम हो जाते हैं उसके लिए बस तुझे निरंतर अपनी चेतना को परिष्कृत करना होता है ।
जय हिंद
जय भारत
सभी आध्यात्मिक और सद्मार्ग पर चलने वाले लोगों को समर्पित।

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