*Unmanifest to Unmanifest through **manifest *
*Unmanifest to Unmanifest through **manifest *
अव्यक्त से व्यक्त होते हुए व्यक्त तक*।। ------------------------------------------/-------------------------जीवन के विकास की प्रक्रिया जितनी प्रत्यक्ष संचालित होती है उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष संचालित होती है।जो कि अव्यक्त से व्यक्त होते हुए फिर अव्यक्त होकर संचालित होती है। और यह प्रक्रिया जीवन के विकास की प्रत्यक्ष संचालन से कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष संचालन की होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे आप एक बीज बोते है तो उससे सबसे पहले अंकुरण होता है फिर वह कुछ दिनों के बाद खेत की सतह से बाहर आता है और फिर उसमें तना (stem) बनते हुए शाखाएँ बन जाती है और देखते ही देखते एक बड़ा वृक्ष बन जाता है।और फिर उसमें फूल और फल लगते हैं उसके बाबजूद भी वह पृथ्वी से अपना अस्तित्त्व नही खोता है।और जब वह पौंधा पूर्ण रूप से परिपक्व हो जाता है तब उसमें बीज बन जाते हैं और फिर वही बीज नये पौधों को जीवन देने के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं। इस प्रकार जीवन एक सतत ( continuous) चलने वाली प्रक्रिया है।जिसमे एक *अप्रत्यक्ष चेतना * विद्यमान रहती है वह एक उपयुक्त माध्यम मिलने पर अव्यक्त से व्यक्त होते हुए फिर अव्यक्त हो जारही है। और यहाँ समझने की एक बात यह जरूरी है इस जीवन की प्रक्रिया को संचालन करने में जो समय प्रत्यक्ष लगता है उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष संचालन मे लगता है। यह बहुमूल्य ज्ञान उन सभी महानुभावों को समर्पित है जो यह कहते हैं कि हमने जीते जी अपने माता-पिता की खूब सेवा की है मरने के बाद क्या करना है जी?मरने के बाद किसने क्या देखा? मैं उन सभी सज्जनो को बताना चाहता हूँ कि मरणोपरांत भी माता पिता का वही अस्तित्व होता है जो जीते जी था।वह कभी ना खत्म होने वाली अखंड सत्ता होती है जो जीवन पर्यन्त बनी रहती है। जिस प्रकार पेड़ का धरती माँ से अस्तित्त्व बना रहता है। अतः प्राकृतिक रूप से संचालित होनी वाली जीवन प्रक्रिया का आनन्द ले।अनावश्यक तनावों से बचें। जय गुरुदेव। जय हिंद ।बृजेश जोशी।
अव्यक्त से व्यक्त होते हुए व्यक्त तक*।। ------------------------------------------/-------------------------जीवन के विकास की प्रक्रिया जितनी प्रत्यक्ष संचालित होती है उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष संचालित होती है।जो कि अव्यक्त से व्यक्त होते हुए फिर अव्यक्त होकर संचालित होती है। और यह प्रक्रिया जीवन के विकास की प्रत्यक्ष संचालन से कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष संचालन की होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे आप एक बीज बोते है तो उससे सबसे पहले अंकुरण होता है फिर वह कुछ दिनों के बाद खेत की सतह से बाहर आता है और फिर उसमें तना (stem) बनते हुए शाखाएँ बन जाती है और देखते ही देखते एक बड़ा वृक्ष बन जाता है।और फिर उसमें फूल और फल लगते हैं उसके बाबजूद भी वह पृथ्वी से अपना अस्तित्त्व नही खोता है।और जब वह पौंधा पूर्ण रूप से परिपक्व हो जाता है तब उसमें बीज बन जाते हैं और फिर वही बीज नये पौधों को जीवन देने के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं। इस प्रकार जीवन एक सतत ( continuous) चलने वाली प्रक्रिया है।जिसमे एक *अप्रत्यक्ष चेतना * विद्यमान रहती है वह एक उपयुक्त माध्यम मिलने पर अव्यक्त से व्यक्त होते हुए फिर अव्यक्त हो जारही है। और यहाँ समझने की एक बात यह जरूरी है इस जीवन की प्रक्रिया को संचालन करने में जो समय प्रत्यक्ष लगता है उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष संचालन मे लगता है। यह बहुमूल्य ज्ञान उन सभी महानुभावों को समर्पित है जो यह कहते हैं कि हमने जीते जी अपने माता-पिता की खूब सेवा की है मरने के बाद क्या करना है जी?मरने के बाद किसने क्या देखा? मैं उन सभी सज्जनो को बताना चाहता हूँ कि मरणोपरांत भी माता पिता का वही अस्तित्व होता है जो जीते जी था।वह कभी ना खत्म होने वाली अखंड सत्ता होती है जो जीवन पर्यन्त बनी रहती है। जिस प्रकार पेड़ का धरती माँ से अस्तित्त्व बना रहता है। अतः प्राकृतिक रूप से संचालित होनी वाली जीवन प्रक्रिया का आनन्द ले।अनावश्यक तनावों से बचें। जय गुरुदेव। जय हिंद ।बृजेश जोशी।
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