भारत

भारत--वेद भूमि देव भूमि पूर्ण भूमि भारत
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भारत--वेद भूमि है
पूर्ण ज्ञान और उसकी अनन्त संगठन शक्ति की भूमि

1. भारत  ऋग्वेद की भूमि है-यह शांत और गतिशील में पूर्ण है।

2. भारत  सामवेद  की भूमि है-यह जागृति में बह रही है।

3. भारत  यजुर्वेद की भूमि है-यह प्रदान और सृजन कर रही है।

4. भारत  अथर्ववेद की भूमि है-यह पूर्णता मे प्रतिध्वनित है।

5. भारत  शिक्षा की भूमि है-यह अभिव्यक्त कर रही है।

6. भारत  कल्प की भूमि है-यह परिवर्तन कर रही है।

7. भारत  व्याकरण की भूमि है-यह विस्तार कर रही है।

8. भारत  निरुक्त की भूमि है-यह आत्म स्थित है।

9. भारत  छन्द की भूमि है-यह मापन कर रही है और बड़ा रही है।

10. भारत  ज्योतिष की भूमि है-यह सब कुछ जान रही है।

11. भारत  न्याय की भूमि है-यह विभेदन और निश्चयन कर रही है।

12. भारत  वैशेषिक की भूमि है-यह विशेष रूप से विवरण दे रही है।

13. भारत  सांख्य की भूमि है-यह गणना कर रही है।

14. भारत  योग की भूमि है-यह एकीकृत कर रही है ।

15. भारत  कर्ममीमांस की भूमि है-यह विश्लेषण कर रही है।

16. भारत  वेदान्त की भूमि है-यह पूर्ण जागृत है।

17. भारत  गन्धर्ववेद की भूमि है-यह संघटित और समायोजन कर रही है। 

18. भारत  धनुर्वेद की भूमि है-यह अजेय और गतिमान है।

19. भारत  स्थापत्यवेद की भूमि है- यह स्थापन/निर्माण कर रही है।

20. भारत  हारीत सहिंता की भूमि है-यह पोषण कर रही है।

21. भारत  भेल संहिता की भूमि है-यह भेद उत्पन्न कर रही है।

22. भारत  काश्यप संहिता की भूमि है-यह समतुल्य कर रही है।

23. भारत  चरक संहिता की भूमि है-एक साथ पकड़कर एवं सहारा देकर तौल रही है।

24. भारत  सुश्रुत संहिता की भूमि है-यह अलग-अलग कर रही है।

25. भारत  वाग्भट्ट संहिता की भूमि है-यह संप्रेषण और वाग्मिता है।

26. भारत  माधव निदान संहिता की भूमि है-यह रोग निदान कर रही है।

27. भारत  शारंगधर संहिता की भूमि है-यह संश्लेषित कर रही है।

28. भारत  भाव-प्रकाश संहिता की भूमि है-यह प्रकाशित कर रही है।

29. भारत  उपनिषद् की भूमि है-यह भावातीत कर रही है।

30. भारत  आरण्यक की भूमि है-यह आंदोलित कर रही है।

31. भारत  ब्राह्मण की भूमि है-यह गठन कर रही है।

32. भारत  इतिहास की भूमि है-यह पूर्णता में खिल रहा है।

33. भारत  पुराण की भूमि है-यह प्राचीन और शाश्वत है।

34. भारत  स्मृति का देश है-यह स्मृति है।

35. भारत  ऋग्वेद प्रातिशाख्य की भूमि है-यह पूर्णता में सर्वव्यापक है।

36. भारत  शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य की भूमि है-यह शांत होकर भाग ले रही है,और फैल रही है।

37. भारत  अथर्ववेद प्रातिशाख्य की भूमि है-यह खोल रही है।

38. भारत  अथर्ववेद प्रातिशाख्य (चतुरध्यायी) की भूमि है।

39. भारत  कृष्ण-यजुर्वेद प्रातिशाख्य की भूमि है-यह सर्वव्यापिक है।

40. भारत  सामवेद प्रातिशाख्य की भूमि है-यह अंगों को अव्यक्त किन्तु पूर्णता को व्यक्त कर रही है।

जीवन में पूर्णता का अर्थ है-शांति,सुख,स्वास्थ, विकास और संतुष्टि जो सभी वेद की जागृति पर आधारित है-पूर्ण ज्ञान-जो प्रत्येक की आत्मा में,प्रत्येक के अपने ही 'स्व' में प्रत्येक की अपनी चेतना में है।

                              जय हिंद

                         भारत,प्रतिभारत

                           बृजेश जोशी

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